तर्ज - वीरा प्रभु के ये बोल…
अन्तर में प्रत्यक्ष निहार, तेरा प्रभु तुझमें विराजे ।
मिथ्यात्व मोह निवार, तेरा प्रभु तुझमें विराजे ।। टेक ।।
नो कर्म न्यारे, द्रव्यकर्म न्यारे, भावकर्म न्यारे, परिणाम न्यारे ।
गुणभेद न्यारे विचार, तेरा प्रभु तुझमें विराजे ।।1 ।।
विशेष गर्भित सामान्य ध्रुव है, जिसमें विकल्पों का अवसर ही कब है ?
द्रव्यदृष्टि अवधार, तेरा प्रभु तुझमें विराजे । ।2 ।।
नित्य निरंजन ब्रह्म स्वरूप, स्वयंसिद्ध प्रभु शुद्ध चिद्रूप।
ज्ञायक स्वरूप अविकार, तेरा प्रभु तुझमें विराजे ।।3 ।।
जानो पहिचानो श्रद्धो ध्याओ, और विकल्प चित्त नहीं लाओ।
रहो सु जाननहार, तेरा प्रभु तुझमें विराजे । ।4।।
स्रोत: भक्ति-भावना (द्वितीय खण्ड)
Artist: श्री ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’
स्रोत: डॉ. विनोद ‘चिन्मय’