अपने चेतन का सुध्यान धरूँगा | apane chetana ka sudhyana dharu nga

अपने चेतन का सुध्यान धरूँगा।

ध्यान धरूँगा, करम हरूँगा, भवदधि पार करूँगा।। टेक।।

चाह विषय भोगों की झूठी, मन में कभी न लाऊँ।
स्वारथ का संसार सभी, चित्त क्यों अपना भरमाऊँ ।।
मैं तो ममता की सारी पीर हरूँगा ।। 1।।

सच्चे देव-शास्त्र-गुरु शासन पर, अपना निश्चय लाऊँ।
अर्थ सहित सातों तत्त्वों को, समझ के मन समझाऊँ ।।
मैं तो हृदय में सत्य श्रद्धान करूँगा ।। 2 ।।

किसके मात-पिता-सुत-दारा, किससे प्रीति बढ़ाऊँ।
हम न किसी के कोई न हमारा, किस पर नेह लगाऊँ।।
मैं तो निज-पर का भेद-विज्ञान करूँगा ।। ३ ।।

घट अन्दर मिथ्यात्व अंधेरा, ताका नाश कराऊँ।
करम-करमफल द्विविध चेतना, छिन में दूर भगाऊँ।।
मैं तो अपने में अपना ही ज्ञान करूँगा ।।4।।

शुद्ध उपयोग जला दीपक निज आतम दर्शन पाऊँ।
ज्ञान चेतना जगे अन्दर, अन्तर लीन हो जाऊँ ।।
मैं तो आतम के गुणों का ज्ञान करूँगा ।। 5 ।।

आतम अनुभव करूँ आप में, ज्ञान उपयोग लगाऊँ।
पर में निज उपयोग न जावे, ऐसा यतन कराऊँ ।।
मैं तो अपने में अपना उपयोग धरूँगा ।।6।।

सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चरण तीनों को एक बनाऊँ ।
शुद्ध चिदातम जाप जपूँ, कर्मों का जोर हटाऊँ।।
मैं तो निज का आनंद रस पान करूँगा ।। 7 ।।


स्रोत: जिन भक्ति सिंधु
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’