तर्ज : तुम्हारे दर्श बिन …
अहो ! प्रभु ध्यान की मुद्रा, परम आनन्ददाता है ।
ध्येय ध्रुव रूप शुद्धातम, सहज अनुभव में आता है।। टेक ।।
नशे अविवेक दुखकारी, भगे दुर्मोह तम तत्क्षण।
सर्व दुर्वासना मिटती, ज्ञान सूरज उगाता है ।।1।।
ज्यों दृष्टा ज्ञाता हैं जिनवर, त्यों मैं भी दृष्टा ज्ञाता हूँ।
सर्व दोषों से नित न्यारा, शुद्ध चिद्रूप दिखाता है।।2।।
मिली सुख शान्ति निज में ही, अपरिमित प्रभुता निज में है।
तृप्त निज में हुआ स्वामिन्, न बाहर कुछ सुहाता है।।3।।
नहीं अब भय रहा कुछ भी, प्रलोभन भी न कुछ प्रभु है।
स्वयंसिद्ध पूर्ण परमातम, पूर्ण शाश्वत रहाता है ।।4।।
सहज भाऊँ, सहज ध्याऊँ, सहज रम जाऊँ निज में ही।
सहज कट जावें भव बन्धन, सहज ही मोक्ष पाता है।।5।।
स्रोत: भक्ति-भावना (द्वितीय खण्ड)
Artist: श्री ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’
स्रोत: डॉ. विनोद ‘चिन्मय’