तर्ज : जगत् में सो…
अद्भुत शान्त दशा निरखत ही, शीश झुके स्वयमेव।।टेक ।।
वीतराग सर्वज्ञ हितंकर, हुए सहज स्वयमेव ।
नाम स्वयंभू प्रगटायो, यातें इन्द्रादिक करें सेव ।।1।।
दिव्यध्वनि से जग में वर्ते, धर्मतीर्थ स्वयमेव ।
भव्यजीव निज बोध सु पाकर, त्यागें मिथ्या देव।।2।।
मंगलमय सर्वोदय कारक, तीर्थ अहो जिनदेव ।
वस्तु स्वभाव धर्म है अनुपम, परम अहिंसा एव ।।3।।
महाभाग्य से पाये जिनवर, तजो विभाव कुटेव।
निजानंदमय नित्य निरंजन, ध्याओ आतम देव ।।4।।
स्रोत: भक्ति-भावना (द्वितीय खण्ड)
Artist: श्री ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’
स्रोत: डॉ. विनोद ‘चिन्मय’