आज का दिवस है मंगलकारी, आज का दिवस है आनन्दकारी।
महाभाग्य से हमने पाई, जिनवाणी निज-पर हितकारी ।। टेक ।।
तत्त्वों का हम मर्म पिछाना, पाया भेदज्ञान अविकारी।
स्वानुभूति की कला प्रकाशी, वीतराग परिणति विस्तारी ।। 1 ।।
दीखे जग अनित्य अरु अशरण, इन्द्रिय भोग महा दुखकारी।
ऐसा हो पुरुषार्थ हमारा, होऊँ सहज महाव्रतधारी।। 2।।
सब संकल्प-विकल्प नशावें, ध्यान दशा होवे सुखकारी।
परम साध्य पावें लोकोत्तम, सफल भावना होय हमारी ।। 3 ।।
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ १५३
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’