अरे चेतन समझत नाहीं, कोलग कहूँ समझाय
अरे चेतन समझत नाहीं, कोलग कहूँ समझाय ॥टेक ॥
परकी को अपनी कर मानी; अपनी खबर न पाय।
या कारण नित जग में भटके जन्म मरण दुःख पाय ॥१॥ अरे. चेतन…
जब चेतन निज रूप सम्हाले फिर नहीं पर संग जाय।
आप आपमें रमत जोहरी परमानन्द लहाय ॥२॥ अरे. चेतन…
स्रोत: आध्यात्मिक भजन संग्रह (सं. श्री सौभाग्यमल जैन, पं. टोडरमल स्मारक ट्रस्ट, जयपुर, २००६), भजन ७७ (विभिन्न कवियों के भजन)