तर्ज : आनंद आयो रे…
आनंद छाया रे, सिद्धचक्र के पाठ में।।टेक ।।
रत्नत्रय के रत्न लुट रहे, अनुभव के प्रसाद।
जन्म-जन्म का दारिद्र नाशक, नाशे सर्व विषाद ।।
मन हर्षाया रे … ।।1।।
सिद्धों की महिमा को देख, अपनी महिमा आय।
संशय मोह विपर्यय मिटता, आत्मज्ञान प्रगटाय।।
मोह पलाया रे…।।2।।
झूठी पर की आस तजी, अब निज में ही सुख पाऊँ।
तज मिथ्या संकल्प विकल्प, सु निज में ही रम जाऊँ ।।
अवसर पाया रे…।।3।।
सिद्धप्रभु को भाव नमन है, निज प्रभुता दरशाई ।
अपनी अक्षय निधि अपने में, प्रत्यक्ष देय दिखाई ।।
अनुभव आया रे…।।4।।
स्वयं स्वयं में तृप्त रहूँ, बस यही भावना स्वामी।
राग-द्वेष से रहित परिणति, होवे अन्तर्यामी ।
भाव जगाया रे…।।5।।
स्रोत: भक्ति-भावना (द्वितीय खण्ड)
Artist: श्री ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’
स्रोत: डॉ. विनोद ‘चिन्मय’
स्रोत: जिन-भक्ति सिंधु, पृष्ठ २७६ से २७७