आयु रही अब थोड़ी कहा करै मोरी मोरी | Aayu Rahi Ab Thodi Kaha Karai Mori Mori

आयु रही अब थोड़ी कहा करै मोरी मोरी

(राग काफी होरी)

आयु रही अब थोड़ी कहा करै मोरी मोरी ॥टेर ॥

मात तात परलोक सिधारे, पास रही ना गौरी ।
सुत मित बाँधव राज संपदा, छिन छिन विनशत सोरी,
फेर नहीं मिलत बहोरी ॥१॥

तन पिंजर अब जरजर दीखत, लाल पडे मुख ओरी।
रींट गीट कफ मिटते नाहीं, दांत दाढ़ जड छोडी,
सहे दुख दरद घनोरी ॥२॥

रोग पिशाच लगे तन भीतर, अग्नि भई मंदोरी।
वात पित्त कफ नित घटबढ़ है, यों बहु विपति सहोरी,
कहत नहीं आवै औरी ॥३॥

कर पग कंपत नाड दरद सिर, कमर कूब निकसो री।
लकड़ी डिंगत हाथ डोकर के तोभी समझे न घोरी,
याकी मति मोह मरोरी ॥४॥

या विधि परख पिछान जोहरी, तनसे ममत तजो री।
आपही आप रमो निज उरमें, आय मिले शिव गौरी।
होय परमानन्द बहोरी ॥५॥


स्रोत: आध्यात्मिक भजन संग्रह (सं. श्री सौभाग्यमल जैन, पं. टोडरमल स्मारक ट्रस्ट, जयपुर, २००६), भजन ५० (विभिन्न कवियों के भजन)

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