आतम महबूब यार | Aatam Mehbub yaar

आतम महबूब यार

आतम महबूब यार, आतम महबूब
देखा हमने निहार, और कुछ न खूब।।आतम. ।।
पंचिन्द्रीमाहिं रहै, पाचों तैं भिन्न ।
बादल में भानु तेज, नहीं खेद खिन्न ।।आतम. ।।१ ।।
तनमें है तजै नाहिं, चेतनता सोय ।
लाल कीच बीच पर्यो, कीचसा न होय ।।आतम. ।।२ ।।
जामें हैं गुन अनन्त, गुनमें है आप ।
दीवे में जोत जोत में है दीवा व्याप ।।आतम. ।।३ ।।
करमोंके पास वसै, करमोंसे दूर ।
कमल वारि माहिं लसै, वारि माहिं जूर ।।आतम. ।।४ ।।
सुखी दुखी होत नाहिं, सुख दुखकेमाहिं ।
दरपनमें धूप छाहिं, घाम शीत नाहिं ।।आतम. ।।५ ।।
जगके व्योहाररूप, जगसों निरलेप ।
अंबरमें गोद धर्यो, व्योमको न चेप ।।आतम. ।।६ ।।
भाजनमें नीर भर्यो, थिरमें मुख पेख ।
`द्यानत’ मन के विकार, टार आप देख ।।आतम. ।।७ ।।

Artist: कविवर द्यानतराय जी

Singer: @Anushri_Jain

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arth

हे मित्र! यह आत्मा ही प्रियतम है। हमने इसको देखा तो पाया कि इससे अधिक उत्तम कुछ भी नहीं है।

यह पाँचों इन्द्रियों के बीच में रहते हुए भी उनसे भिन्न है ,जैसे बादलों के बीच में आने पर भी सूर्य का तेज यथावत रहता है, उसमें कोई कमी नहीं आती।

जैसे रत्न कीचड़ के बीच में पड़ा होने पर भी वह कीचड़ नहीं हो जाता, उसी प्रकार देह में स्थित चैतन्य अपना चैतन्य गुण/चेतना नहीं खोता।

आत्मा में अनंत गुण हैं, वह स्वयं गुणमय है, जैसे दिए में ज्योति है और ज्योति में दिया समाहित है, समाया हुआ है।

कमल का फूल जल में रहकर भी जल से भित्र रहता है (सूखा ही रहता है) उसी भाँति यह आत्मा कर्मों के पास रहकर भी कर्म से सर्वथा भिन्न है ।

जिस प्रकार दर्पण में देखने वाली धूप-छाँह में तपन या ठंडक नहीं होती, उसी प्रकार सुख-दुख में रहकर भी आत्मा स्वयं सुख-दु:खरूप नहीं होती।

आत्मा जगत के सब व्यवहार करते हुए भी जगत से निर्लिप्त है। यह आकाश में ठहरा हुआ भी आकाश से चिपका हुआ नहीं है।

जैसे बरतन में भरे जल के स्थिर होने पर उसमें अपना चेहरा दिखाई पड़ता है, द्यानतराय कहते हैं कि वैसे ही मन के विकारों को, चंचलता को हटाकर अपने शुद्ध स्वरूप को देख।

source- dyanat Bhajan saurabh

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