तर्ज : बार बार श्री गुरु समझावें…
आया अवसर भव्य समझ लो, जिन-आगम का सार।
स्वानुभूति ही मंगलमय है, तिहुँ जग मंगल कार ॥ टेक ॥
वीतराग सर्वज्ञ देव ही, धर्म तीर्थ दातार ।
गुरु निर्ग्रन्थ परम हितकारी, धर्म अहिंसा सार ॥ 1 ॥
स्याद्वादमय श्री जिनवाणी, कहे तत्त्व अविकार।
मोहादिक हैं हेय बताये, वीतरागता सार ॥ 2 ॥
ज्ञान मात्र भी अनेकान्तमय, आतम तत्त्व विचार।
श्रद्धो भाओ ध्याओ भविजन, यही समय का सार ॥ 3 ॥
चमत्कार चैतन्य प्रभु का, अद्भुत आनन्दकार ।
स्वयं जानते सबको जाने, निर्विकल्प अविकार ॥ 4 ॥
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’