अहो नमि जिनप नित नमत शत सुरप
अहो नमि जिनप नित नमत शत सुरप,
कंदर्पगज दर्पनाशन प्रबल पनलपन ।।
नाथ तुम बानि पयपान जे करत भवि,
नसैं तिनकी जरामरन-जामनतपन ।।अहो.।।
अहो शिवभौन तुम चरनचिंतौन जे,
करत तिन जरत भावी दुखद भवविपन ।।
हे भुवनपाल तुम विशदगुनमाल उर,
धरैं ते लहैं टुक कालमें श्रेयपन ।।१।। अहो. ।।
अहो गुनतूप तुमरूप चख सहस करि,
लखत सन्तोष प्रापति भयौ नाकप न ।।
अज, अकल, तज सकल दुखद परिगह कुगह,
दुसहपरिसह सही धार व्रत सार पन ।।२।। अहो. ।।
पाय केवल सकल लोक करवत लख्यौ,
अख्यौ वृष द्विधा सुनि नसत भ्रमतमझपन
नीच कीचक कियौ मीचतैं रहित जिम,
‘दौल’ को पास ले नास भववास पन ।।३।। अहो. ।।
Artist: कविवर श्री दौलत राम जी
स्रोत: दौलत भजन सौरभ, पृष्ठ ८९ से ९०