अहो विदेहीनाथ ! दर्श कर, आनंद उर छाया | Aho Videhinath Dars Kar Anamd Ur Chay

अहो विदेहीनाथ ! दर्श कर, आनंद उर छाया।

चिर से बिन पहिचाना, प्रभु अन्तर में दर्शाया।।1।।

देखत हुआ निहाल, मुक्ति का मारग मैं पाया।
सहज उछलता ज्ञान सिन्धु, अन्तर में दिखलाया।।2।।

स्वाश्रय से ही दुःख मिटे, विश्वास प्रभो! आया।
पर से भिन्न सहज आनंदमय, ज्ञायक प्रभु भाया।।३।।

भक्ति-भावना 127
हुई विरक्ति विषयों से, निर्ग्रन्थ रूप भाया।
सहजपने निज में रमने का, भाव सु उमगाया।।4।।

जगे परम पुरूषार्थ प्रभो ! चरणों में शिरनाया।
प्रभु प्रसाद सर्वस्व सु-अपना, अपने में पाया।।5।।


स्रोत: भक्ति-भावना (द्वितीय खण्ड)
Artist: श्री ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’
स्रोत: डॉ. विनोद ‘चिन्मय’