अहो ! दशलक्षण धर्म महान्’ ।
महाभाग्य से अवसर आया, पूजो भवि अम्लान।। टेक।।
क्षमा भाव से क्रोध मिटावे, सहज शान्ति तब ही उपजावे ।
सब ही आप समान सु भासे, विनयभाव बहु गुण परकाशे ।।
नाशें सर्व दोष दुःखखान।। 1।।
सरल भाव से प्रिय हो सबका, नाशे पाप अरे भव-भव का।
तृष्णा लोभ मिटे दुखदायी, संतोषी ध्रुव प्रभुता पायी ।।
इन्द्रादिक भी पूजें आन।। 2।।
सत्य धर्म सबका आधार, संयम निज-पर को हितकार।
निर्वांछक तप कर्म नशावे, त्यागी सहज परम सुख पावे ।।
जग में होवे यश अम्लान ।। 3।।
भेदज्ञान अंतर में जाने, पर को किंचित् निज नहीं माने।
परम ब्रह्म में रमत मुनिवर, अल्पकाल में होते जिनवर ।।
होते स्वयं सिद्ध भगवान्।। 4।।
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ २८३ से २८४
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’