ऐसो सुमिरन कर मेरे भाई
ऐसो सुमिरन कर मेरे भाई ।
पवन थंभै मन कितहूँ न जाई ।
परमेसुर सौं साँच रहीजै,
लोक-रंजना को तज दीजै ॥टेक॥
जप अरु नेम दोउ विधि धारै,
आसन प्राणायाम सँभारै ।
प्रत्याहार धारना कौजै,
ध्यान समाधि महारस पीजै ॥एसो…१॥
सो तप तपो बहुरि नहिं तपना,
सो जप जपो बहुरि नहिं जपना ।
सो व्रत धरों बहुरि नहिं धरना,
ऐसो मरो बहुरि नहिं मरना ॥एसो…२॥
पंच परावर्तन लखि लीजै,
पाँचों इन्द्री को न पतीजै ।
‘द्यानत’ पाँचों लच्छि लहीजै,
पंच-परम-गुरु शरन गहीजै ॥एसो…३॥
Artist: पं. द्यानतराय जी
स्रोत: nikkyjain.github.io (पं द्यानतराय कृत भजन)
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