आत्मन् ! दुश्चिंतन नहीं करो, सम्यक् चिंतन ही सदा करो | atman dushchimtana nahim karo samyak chimtana hi sada karo

आत्मन् ! दुश्चिंतन नहीं करो, सम्यक् चिंतन ही सदा करो।

समाधान अंतर में होगा, अन्तर्मुख पुरुषार्थ करो ॥ टेक ॥
पर द्रव्यों का दोष नहीं है, दुर्विकल्प दुःखरूप तजो।
ज्ञानानंदमयी शुद्धातम, सहजपने स्वीकार करो ॥ 1 ॥

मत भटकाओ अपने मन को, कहीं नहीं सुख प्राप्त करो।
झूठी पर की आशा त्यागो, सम्यक् तत्त्व विचार करो ॥ 2 ॥

अपना सुख तो अपने में ही, प्रभुवर का विश्वास करो।
सच्ची भक्ति यही प्रभुवर की, अपने में ही तृप्त रहो ॥ 3 ॥


स्रोत: जिन भक्ति सिंधु
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’