ओम् जय महावीर प्रभो, स्वामी जय महावीर प्रभो।
वर्द्धमान-अतिवीर-वीर अरु सन्मति नाम विभो ।। टेक ।।
आत्मज्ञानी विरागी समदृष्टि धारी, स्वामी समदृष्टि धारी।
मिथ्या मोह विनाशक, ज्ञान ज्योति जागी ।। ओम जय. ।। 1 ।।
जल तैं भिन्न कमल ज्यों रहिये, घर में बालयती।
राजपाट ऐश्वर्य छोड़ सब, ममता मोह हती ।। ओम जय. ।। 2 ।।
बारह वर्ष मुनिव्रत लेकर, आतम ध्यान किया।
शुक्लध्यान में कर्म जलाकर, अर्हत् पद सु लिया।। ओम जय. ।। 3 ।।
वीतराग सर्वज्ञ हितैषी, शिवमग परकाशी।
हरि हर ब्रह्मा नाथ तुम्हीं हो, जय-जय अविनाशी ।। ओम जय. ।। 4 ।।
पावापुर के बीच सरोवर, आकर योग तजे।
हन अघातिया दुष्ट कर्म सब, शिवपुर जाहि बसे ।। ओम जय ।। 5 ।।
द्रव्य तथा गुण पर्यय से जो, प्रभु तुमको जाने।
वह निज आतम को पाकर फिर सकल मोह हाने ।। ओम जय. ।।6।।
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ १३२
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’