अब मेरे जीवन में सम्यक्त्व रूपी सावन आ गया है। मिथ्यात्व, कुरीति व कुमतिरूप ग्रीष्म की तपन अब समाप्त हो गई, इसलिए यह सम्यक्त्वरूपी पावस (वर्षा) ऋतु अत्यन्त सुहावनी लगती है। अब आत्मानुभवरूपी विद्युत (बिजली) की चमकार होने लगी है, आनन्द और अनुराग (भक्ति ) रूपी बादलों की घटा घनी हो चली है, जिसे देखकर विवेकरूपी पपीहे की ध्वनि मुखरित होने लगी है, सुनाई देने लगी है जो सुमतिरूपी सुहागिन को अत्यन्त प्रियकर है।
जैसे बादलों को देखकर मोर पक्षी का मन नाच उठता है, आनन्दित होता है, उसी प्रकार सद्गुरु की उपदेशरूपी गर्जन को सुनकर साधक को सुखानुभूति होती है। साधक के हृदय में बहुप्रकार से भक्ति-भाव के अंकुर फूटने लगते हैं और आनंद की अनुभूति में सरस अभिवृद्धि होती है।
जैसे बरसात के कारण धूलि भीगकर जम जाती है, उसकी प्रवृत्ति/ चंचलता नष्ट हो जाती है। उसी प्रकार समतारस की धारा बरसने से अब भूलरूपी (भ्रमरूपी) धूल अब भूल से भी कहीं दिखाई नहीं पड़ती। भूधरदास जी कहते हैं कि जिसे निजानन्द की अनुभूति अपने ही भीतर होने लगी हो तो उसे बाहर निकलने से क्या प्रयोजन रह गया!
{ऐसा कहा जाता है कि भूधरदास जी के घर की छत वर्षाकाल में चूती (टपकती) थी, जिसके कारण रात भर यहां से वहां स्थान बदलना पड़ता था और निद्रा ले सकना संभव नहीं हो पाता था। तो कवि लिखते हैं कि अब मैं ऐसे घर (निजघर) में पहुंच गया हूं, जहां की छत चूती नहीं है और वहां से इसलिए अब निकलने की आवश्यकता ही प्रतीत नहीं होती।-- पं. मनीष जी मेरठ के समयसार पर व्याख्यान से साभार}
सुरति = भक्ति, अनुराग = आनन्द, विहसार्यो = प्रसन्न होना, निरचू = बिल्कुल/ वह छत जो चूती (टपकती) नहीं है।