आत्मा स्वतंत्र है, सत्ता स्वतंत्र है, स्वरूप स्वतंत्र है, परिणमन स्वतंत्र है ॥ टेक ॥
कण-कण स्वतंत्र है, यही जिन तंत्र है।
वस्तु का स्वभाव यही, सुख का उपाय यही ॥ 1 ॥
आगम से जानो, गुरुओं से जानो ।
युक्ति से पिछानो, कर स्वानुभव श्रद्धानो ॥ 2 ॥
कहा भगवान यही, साँचा कल्याण यही।
मुक्ति का विधान यही, धर्म का आधार यही ॥ ३॥
विश्व है अनादि-निधन, छह द्रव्य अनादि-निधन ।
सात तत्त्व अनादि-निधन, धर्म है अनादि-निधन ॥ 4 ॥
जब होवे भेदज्ञान, तब ही हो धर्मध्यान।
मोह का हो अवसान, जीव होवे भगवान ॥ 5॥
ये ही परम साध्य है, शुद्धात्मा आराध्य है।
ज्ञेय श्रद्धेय ध्येय निज आत्मा ही श्रेय है ॥ 6 ॥
विकल्पों से बस हो, कषायों से वश हो।
पर से अवश हो, आत्मन् ! स्व वश हो ॥ 7 ॥
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’