अहो ! भाग्य है मेरा, मैं जिनवर दर्शन पाया | aho bhagya hai mera maim jinavara darshana paya

तर्जः तुझे बेटा कहूँ की वीरा…

अहो ! भाग्य है मेरा, मैं जिनवर दर्शन पाया।

लख शान्त स्वरूप जिनेश्वर, आनन्द हृदय में छाया ।। टेक ।।

भव-भव में अब तक भटका, हे नाथ! तुम्हें बिन जाने ।
शुभ काललब्धि है आई, देवागम गुरु पहिचाने ।।
अक्षय शिव सुख प्रदाता, वीतराग धर्म को पाया।। 1।।

हे देव! कहूँ क्या महिमा, चक्री भी शीस नवावें।
गणधर इन्द्रादिक भी तो, अति हर्षित हो गुण गावें ।।
क्या अनुपम समवशरण प्रभु, अनुपम ही तीर्थ बताया ।। 2 ।।

तत्त्वों की जगी प्रतीति, जिन ! भेदज्ञान है जागा।
निज अनुभव कला प्रकाशी, दुर्मोह महातम भागा।।
बाहर से हुई उदासी, निर्ग्रन्थ स्वरूप सुहाया।। 3।।

उपसर्गों की नहीं चिन्ता, नहीं रिद्धि-सिद्धि अभिलाषा ।
निरपेक्ष निरामय ज्ञायक, परिपूर्ण स्वयं में भासा ।।
अपने में ही रम जाऊँ, निस्पृह हो शीस नवाया।। 4।।


स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ ६७ से ६८
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’