अनेकांतमय वस्तु स्वरूप, स्याद्वादमय श्री जिनवाणी।
हो एकाग्र नित्य अभ्यासें, वे ही होवें सम्यक् ज्ञानी ॥ टेक ॥
परम पुरुष आदर्श हैं जिनके, तत्त्वों का निर्णय है जिनके ।
भेद-विज्ञान हृदय में धरते, शुद्धातम का अनुभव करते ॥
सफल करें निज जिन्दगानी ॥ 1 ॥
वीतराग प्रभुवर के भक्त, गुरु निर्ग्रन्थों के ही शिष्य।
करें निरन्तर ज्ञानाभ्यास, करते कभी न पर की आस ॥
धर्म अहिंसा के श्रद्धानी ॥ 2 ॥
नित वैराग्य भावना भाते, नहीं विकल्पों में अटकाते।
मुक्तिमार्ग में बढ़ते जाते, शंका चिंता भय नहीं लाते ॥
धन्य-धन्य वे भेद-विज्ञानी ॥ 3 ॥
उनका हो जीवन निर्दोष, देखें कभी न पर का दोष।
निज दोषों की निंदा करते, निज निर्दोष स्वभाव निरखते ॥
वे ही होते आतम ध्यानी ॥ 4 ॥
मन में कोई नहीं विकार, सदा करें निज-पर उपकार।
सहज ही रहते जाननहार, भाव नमन उनको अविकार ॥
कभी न करते हैं मनमानी ॥ 5॥
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ २६५ से २६६
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’