अहो ! अहो ! जिनवाणी माता, सहज समागम पाया है | aho aho jinavani mata sahaja samagama paya hai

तर्जः बड़ी भली है जिनवाणी माँ…

अहो ! अहो ! जिनवाणी माता, सहज समागम पाया है।
जिनवाणी की चर्चा सुनकर, आनंद उर न समाया है ॥ टेक ॥
वीतराग सर्वज्ञ देव, निर्ग्रन्थ गुरु पहिचाने हैं।
अहो प्रयोजनभूत तत्त्व नौ, जिनवाणी से जाने हैं॥
माता तेरे ही प्रसाद से, भेदज्ञान प्रगटाया है ॥ 1 ॥

जिनको हमने अपना समझा, वे अति भिन्न दिखाये हैं।
तुच्छ असार जगत् के वैभव, भोग न रंच सुहाये हैं ॥
अहो ! देह भी लगे पड़ौसी, अशरीरी प्रभु भाया है ॥ 2 ॥

अन्य न कोई दुःख के कारण, व्यर्थ मोहवश क्लेश सहे ।
रहे उलझते पर्यायों में, अपने से अनजान रहे ॥
धन्य-दिवस धनि-घड़ी आज की, ज्ञायक प्रभु दर्शाया है ॥ 3 ॥

जिसकी महिमा में परमेष्ठी, प्रभु भी अन्तर्लीन रहें।
तृप्त स्वयं में तुष्ट स्वयं में, सहज सदा स्वाधीन रहें ॥
शाश्वत अनुपम निज परमेश्वर, प्रत्यक्ष अनुभव आया है ॥ 4 ॥

यही भावना ज्ञानानंदमय, निर्ग्रन्थ पद में होय विहार।
ज्ञान-ध्यान-तप लीन रहूँ नित, लगें नहीं कोई अतिचार ॥
रहूँ सहज निष्काम निराकुल, सविनय शीश नवाया है ॥ 5॥


स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ १६१ से १६२
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’