हे भव्य ! तुम अपनी आत्मा का अनुभव करो जिससे जन्म-बुढ़ापा-मरणरूपी रोग का नाशकर तुम अनन्तकाल के लिए अपने आत्म-स्वभाव में स्थिर हो जावो । देव, गुरु और शास्त्र में पूर्ण श्रद्धाकर, विश्वास कर, उसके विपरीत कुदेव, कुगुरु और कुशास्त्र का त्याग करो। छह द्रव्य, नवत्तत्त्व को भी भली प्रकार जानकर, परखकर इस चेतन का सार-ज्ञान को पूर्णरूप से ग्रहण करो, अंगीकार करो। द्रव्यकर्म और नौकर्म को अपने से भिन्न जानकर अपने शुद्ध स्वरूप को अत्यन्त सूक्ष्म अर्थात् गहरी दृष्टि से धारण करो। सभी द्रव्यकर्मों को भावकर्मों से भिन्न जानकर मात्र बुद्धि के विलास में तर्क-कुतर्क मत करो। स्वयं, अपने आप जो कुछ जाना जाए वह ही अनुभव कहलाता है। द्यानतरायजी कहते हैं, मुझे मोक्ष का, शिव का ऐसा ही अनुभव मिले। मोक्ष-प्राप्ति के लिए आत्म-अनुभव के अतिरिक्त और कोई उपाय है ही नहीं। जो ऐसा उपाय कर लेता है, आत्म-अनुभव कर लेता है वह ही मोक्ष पाता है, वही दक्ष कहलाता है, निपुण कहलाता है।