आज का दिवस है मंगलकारी, आज का दिवस है आनंदकारी ॥ टेक ॥
महाभाग्य से हमने पाया, दुर्लभ ब्रह्मचर्य सुखकारी।
हुए निःशल्य निराकुल निश्चल, दूर हुई हैं दुविधा सारी ॥ 1 ॥
जिनवाणी माँ के प्रसाद से, मिटें सहज ही भाव विकारी।
तत्त्वाभ्यास सदा ही वर्ते, परिणति होवे नित अविकारी ॥ २॥
अनाचार लगने नहिं पावें, होवें निश्चय शिवमगचारी।
साक्षात् जिन मारग पाऊँ, निर्ग्रन्थ दशा परम हितकारी ॥ ३॥
कर्म कलंक समूल नशाऊँ, होऊँ ध्रुव चैतन्य विहारी।
होवे जीवन सफल हमारा, प्रभु चरणों में धोक हमारी ॥ 4॥
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’