इस दुखमा पंचमकाल में, गुरु अमृत बरसायो | isa dukhama pamchamakala mem guru amrrita barasayo

तर्ज : कहबे को मन सूरमा करवे को काचा…

इस दुखमा पंचमकाल में, गुरु अमृत बरसायो।
अहो ! अहो ! परमागम में, गुरु अमृत बरसायो ॥ टेक ॥
कंठ माँहि देवों के झरता, वह तो अमृत नांहि।
यदि वह साँचा अमृत होता, फिर क्यों वे मर जायें ॥ 1 ॥

जन्म-मरण जिसमें नहीं, नहीं आधि नहीं व्याधि।
नहिं उपाधि चिद्रूप में, वर्ते सहज समाधि ॥ 2 ॥

निज स्वरूप के ज्ञान बिन, पाये दुःख अपार।
ज्ञान मात्र ध्रुव रूप गुरु, दर्शायो अविकार ॥ 3 ॥


स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ १९०
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’