आओ पधारो मम हृदयंगम हे प्रभुवर महावीरा रे…
हे प्रभुवर मम दृष्टि कब हो स्थिर निज में ही वीरा रे ।। (आओ पधारो…)
अब तक पर में चित्त लगाया पर बुद्धि मम भायी रे ।। (आओ पधारो…)
धन की माया दिखती सुन्दर स्वर्ण की बेड़ी भायी रे ।। (आओ पधारो…)
यह संसार महा दुःख सागर इसको सुखमय माना रे ।। (आओ पधारो…)
तुमको मैंने ना पहचाना चिंतामणि सम माना रे ।। (आओ पधारो…)
तुम ने जो जो त्यागा प्रभुवर तुमसे ही वो माँगा रे ।। (आओ पधारो…)
सुख का पिंड है आतम मेरा उसको न पहचाना रे ।। (आओ पधारो…)
अब तो जिनवर मूरत देखी तुम सम निज को पाया रे ।। (आओ पधारो…)
मैं हूं एक अखंड त्रिकाली निज को सुखमय जाना रे ।। (आओ पधारो…)
तुम सम ही अब मैं होऊंगा पूर्ण सुखी निज आश्रय से ।। (आओ पधारो…)
रचयिता - पं. चिद्रूप जैन शास्त्री (कोटा)