तर्जः चाह जगी मुझे…
आओ जी जिनदर्शन को, आओ जी जिन पूजन को।
आओ जी जिनभक्ति को, आओ जी जिन प्रवचन को ।। टेक ।।
आओ सब मिलकर आओ, भक्ति भावना से आओ।
कर्म मैल धोने आओ, आतम हित करने आओ।। 1।।
जिनदर्शन निज दर्शन का, निमित्तभूत है शिवसुख का।
व्यर्थ न भव में भरमाओ,प्रभु ढिंग मुक्ति पथ पाओ।। 2 ।।
पर में निज का अंश नहीं, विषयों में सुख रंच नहीं।
निज सुख निज में ही पाओ, अक्षय प्रभुता प्रगटाओ ।। 3 ।।
कल्पवृक्ष सम जिनमंदिर, धर्म आयतन जिनमंदिर।
तत्त्वभावना भवि भाओ, प्रभु समान ही बन जाओ।। 4।।
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ ६०
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’