ओम् जय केवलज्ञानी, प्रभु जय केवलज्ञानी ।
तुम हो ज्ञान दिवाकर, ज्ञान किरण दानी।। टेक ।।
पर को निज माना मैंने, और पर से मोह किया।
तेरी दिव्यध्वनि सुन प्रभुवर, सब भ्रम दूर हुआ।। 1 ।।
भोगों में सुख मान मूढ़ मैं, उनमें मस्त रहा।
वीतराग-विज्ञान सुखमयी, आतम आज लखा।। 2।।
कोई इष्ट-अनिष्ट नहीं है, झूठी सब भ्रान्ति ।।
तेरे चरणों में आकर के, मिली सहज शान्ति ।। 3 ।।
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ ६२ से ६३
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’