आओ-आओ जिनवर की शरण में।
आओ-आओ प्रभु की शरण में ।। टेक ।।
कैसी शान्त छवि दृष्टि नाशा अहो,
ध्यान मुद्रा अचल आसन अनुपम प्रभो।
प्रेरणा दे रही मुक्तिमार्ग में ।। 1।।
शस्त्र नारी नहीं, वस्त्र भूषण नहीं,
देव सर्वज्ञ अठारह दूषण नहीं।
पूर्ण प्रभुता प्रगट भगवन्त में ।। 2।।
दिव्यध्वनि में ध्वनित दिव्य शुद्धात्मा,
एक ही है उपादेय निज आत्मा।
ज्ञान-आनन्द पाओ स्वयं में ।। 3।।
पूर्ण प्रभुता स्वयं में स्वयं की,
स्वानुभव में सहज है झलकती।
साध्य साधन स्वयं का स्वयं में ।। 4।।
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ ६८
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’