आनंदमय सागर उछले | Aanandmay Sagar Uchhale

आनंदमय सागर उछले, ज्ञायक स्वभाव में।
ज्ञानी निमग्न देखो, ज्ञायक स्वभाव में।। टेक।।

तृप्त स्वयं में ही है, पर की कुछ वांछा नाहिं,
पिछले तो झड़ते जावें, आगामी बंध नाहिं।
मुक्ति तो सहज होवे, रहते निज भाव में।। 1।।

होता है होने योग्य सहज ही विश्व में सब,
करना कुछ दीखे नाहिं, देखे सुदृष्टि से जब।
ज्ञाता-ज्ञाता ही रहता, ज्ञायक स्वभाव में।। 2।।

ज्ञेय तो भिन्न रहते, ज्ञेयों का ज्ञायक नाहिं,
ज्ञायक का ज्ञायक ऐसा, भेद- विकल्प नाहिं।
ज्ञायक तो ज्ञायक ही निरूपम स्वभाव में।। 3।।

सार कुछ नाहिं मिले, बाहर में व्यर्थ भटके,
ज्ञान-सुख अन्तर माहिं, अतंर में से ही प्रगटे।
मनमानी नहीं चलती, वस्तु स्वभाव में।। 4।।

Artist: ब्र० रवीन्द्र जी आत्मन्