तर्ज : झिलमिल सितारों का आँगन होगा
अरहंत सिद्धों को वन्दन मेरा, साधु पदों को नमन हो मेरा,
तीन काल के तीर्थंकर को, वन्दन अगणित हो मेरा ।
अरहंत सिद्धों को वन्दन मेरा, साधु पदों को नमन हो मेरा ।। टेक ।।
जो अनादि से व्यक्त नहीं था, त्रैकालिक ध्रुव ज्ञायक भाव ।
वह युगादि में किया प्रकाशित, वंदन ऋषभ जिनेश्वर राव ।। 1 ।।
जिसने जीत लिया त्रिभुवन को, मोह शत्रु वह प्रबल महान ।
उसे जीतकर शिवपद पाया, वंदन अजितनाथ भगवान ।। 2 ।।
काललब्धि बिन सदा असम्भव, निज सन्मुखता का पुरुषार्थ ।
निर्मल परिणति के स्वकाल में, संभव जिनने पाया अर्थ ।। 3 ।।
त्रिभुवन जिनके चरणों का, अभिनन्दन करता तीनों काल ।
वे स्वभाव का अभिनन्दन कर, पहुँचे शिवपुर में तत्काल ।। 4 ।।
निज आश्रय से ही सुख होता, यही सुमति जिन बतलाते ।
सुमतिनाथ प्रभु की पूजन कर, भव्य जीव शिवसुख पाते ।। 5 ।।
पद्मप्रभु के पद पंकज की, सौरभ से सुरभित त्रिभुवन ।
गुण अनन्त के सुमनों से शोभित, श्री जिनवर का है उपवन ।। 6 ।।
श्री सुपार्श्व के शुभ-सु-पार्श्व में, जिसकी परिणति करे विराम ।
वे पाते हैं गुण अनन्त से, भूषित सिद्ध सदन अभिराम ।। 7 ।।
चारु चन्द्रसम सदा सुशीतल, चेतन - चन्द्रप्रभ जिनराज ।
गुण अनन्त की कला विभूषित, प्रभु ने पाया निजपद राज ।। 8 ।।
पुष्पदन्त सम गुण आवलि से, सदा सुशोभित हैं भगवान ।
मोक्षमार्ग की सुविधि बताकर, भविजन का करते कल्याण ।। १ ।।
चन्द्र किरण सम शीतल वचनों, से हरते जग का आताप ।
स्याद्वादमय दिव्यध्वनि से, मोक्षमार्ग बतलाते आप ।। 10 ।।
त्रिभुवन के श्रेयस्कर हैं, श्रेयांसनाथ जिनवर गुणखान ।
निज स्वभाव से परम श्रेय का, केंद्र बिंदु कहते भगवान ।। 11 ।।
स्रोत: जिनवर भक्ति शतक (सामूहिक जिनेन्द्र पूजन समिति, कोटा)
संकलन: विक्रान्त कुमार जैन · सम्पादन: डॉ. वैद्य दीपक जैन