अहो बनवासी पिया तुम क्यों छारी अरज करै राजुल नारी | Aho Banavasi Piya Tum Kyon Chhari Araj Karai Rajul Nari

अहो बनवासी पिया तुम क्यों छारी अरज करै राजुल नारी

अहो बनवासी पिया तुम क्यों छारी अरज करै राजुल नारी ।
तुम तो परम दयाल सबन के, सबहिन के हितकारी ।।अरज.।।

मो कठिन क्यों भये सजना, कहीये चूक हमारी ।
तुम बिन एक पलक पिया, मेरे जाय पहर सम भारी ।
क्यों करि निस दिन भर नेमजी, तुम तौ ममता डारी ।।१।। अरज. ।।

जैसे रैनि वियोगज चकई तौ बिलपै निस सारी ।
आसि बांधि अपनी जिय राखै प्रात मिलयो या प्यारी ।।
मैं निरास निरधार निरमोही जिउ किम दुख्यारी ।।२।। अरज. ।।

अब ही भोग जोग हौ बालम देखौ चित्त विचारी ।
आगै रिषभ देव भी ब्याही कच्छ-सुकच्छ कुमारी ।।
सोही पंथ गहो पीया पाछै हो ज्यो संजम धारो ।।३।। अरज. ।।

जैसे बिरहै नदी मैं व्याकुल उग्रसैन की बारी ।
धनि धनि समदबिजै के नंदन बूढत पार उतारी ।।
सो ही किरपा करौ हम उपरि ‘भूधर’ सरण तिहारी ।।४।। अरज. ।।


Artist: पं. श्री भूधरदास जी
स्रोत: भूधर भजन सौरभ, पृष्ठ १७ से १८

अर्थ

हे भगवान नेमिनाथ ! हे वनवासी पिया, तुमने मुझे क्यों छोड़ दिया? राजुल (नामकी नारी) आपसे यह अरज करती है। आप तो सभी जीवों के प्रति अत्यन्त दयालु हो, सबका हित करनेवाले हो फिर मेरी ओर ही इतने कठोर क्यों हो गए? कहिए- क्या हमारी कोई चूक गलती हो गई है? हे प्रिय! तुम्हारे बिना एक-एक पल का समय भी एक-एक प्रहर के समान भारी/बड़ा लग रहा है, जैसे-तैसे रात-दिन बीत रहे हैं। हे प्रियतम नेमिनाथ! आपने तो सारी ममता छोड़ दी। चकवी अपने प्रिय के वियोग के कारण रातभर विलाप करती है और आशावान होकर अपने को ढाढस देती है कि सुबह होते ही उसका प्यारा चकवा

स्रोत: भूधर भजन सौरभ।

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