अब तो ऋषभनाथ लौ लागी (कवि राजमल पवैया) | Ab To Rishabhanath Lau Lagi (Rajmal Pavaiya)

अब तो ऋषभनाथ लौ लागी

वीतराग मुद्रा दर्शन कर ज्ञानज्योति उर जागी ।।अब
ज्ञानानंदी शुद्ध स्वभावी निज परिणति अनुरागी ।
भव भोगन से ममता त्यागी भये नाथ बैरागी ।।अब ।।१।।

अष्टापद कैलाश शिखर से कर्म धूल सब त्यागी ।
अनुपम सुख निर्वाण प्राप्ति से भव बाधा सब भागी ।।अब ।।२।।

मेरो रोग मिटा दो स्वामी मैं अनादि को रागी ।
वीतरागता जागे उर में बन जाऊँ बड़ भागी ।।अब ।।३।।


Artist: कवि राजमल जी पवैया
स्रोत: जैन पूजांजलि (श्री रूपचन्द्र सुशीलाबाई दि. जैन ग्रंथमाला, विदिशा, १९९२), प्रारम्भिक भजन