ऐसैं यों प्रभु पाइये | Aisain Yon Prabhu Paiye

ऐसैं यों प्रभु पाइये

ऐसैं यों प्रभु पाइये, सुन पंडित प्रानी ।
ज्यों मथि माखन काढिये, दधि मेल मथानी ॥टेक॥

ज्यों रसलीन रसायनी, रसरीति अराधै ।
त्यों घट में परमारथी, परमारथ साधै ॥१॥

जैसे वैद्य विथा लहै, गुण दोष विचारै ।
तैसे पंडित पिंड की, रचना निरवारै ॥२॥

पिंड स्वरूप अचेत है, प्रभुरूप न कोई ।
जाने माने रवि रहै, घट व्यापक सोई ॥३॥

चेतन लच्छन जीव है, जड लच्छन काया ।
चंचल लच्छन चित्त है, भ्रम लच्छन माया ॥४॥

लच्छन भेद विलोकिये, सुविलच्छन वेदै ।
सत्त-सरूप हिये धरै, भ्रमरूप उछेदै ॥५॥

ज्यों रज सोधै न्यारिया, धन सौ मनकीलै ।
त्यों मुनिकर्म विपाक में, अपने रस झीलै ॥६॥

आप लखै जब आपको, दुविधा पद मेटै ।
सेवक साहिब एक हैं, तब को किहि भेंटे ॥७॥


Artist: पं. बनारसीदास जी
स्रोत: nikkyjain.github.io (पं बनारसीदास कृत भजन)

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