स्वतंत्र है प्रत्येक वस्तु, सर्वदा ही जान तू।
बाह्य दृष्टि छोड़कर, आत्मा पिछान तू।। 1।।
ज्ञानमयी आत्मा, रागादि से भी है परे।
व्यर्थ पर पदार्थों में, राग-द्वेष तू क्यों करे।। 2।।
पर पदार्थ ज्ञेय हैं, आत्मीक ज्ञान के।
किन्तु रहा पर में जीव, इष्ट-अनिष्ट मान के।। 3।।
दुख हेतु ये ही मान्यता, नहीं अन्य दुःख का हेतु है।
जीव के सुख-दुःख में अवरोध निज का हेतु है।। 4।।
छोड़ मिथ्यादृष्टि यदि, श्रद्धान सम्यक् जो धरे।
तो सहज ही मुक्त होवे, सुख स्वयं में अनुभवे।। 5।।
रे आत्मन् ! अब शीघ्र ही तू सीख गुरु की मान ले।
बाह्य सुखाभास तज, आत्म सुख जान ले।। 6।।
अन्यथा भव सिन्धु में ही गोते खाता जायेगा।
चाहे कुछ भी कर उपाय, मोक्ष नहीं पायेगा।। 7।।
एतदर्थ शीघ्र चेत, समय अल्प जान तू।
स्वतंत्र है प्रत्येक वस्तु, सर्वदा ही मग्न तू।। 8।।
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ ३८४
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’