अनुपम शाश्वत शुद्धातम | Anupam Sasvat Suddhatam

तर्ज : कोई कछु कहे…

अनुपम शाश्वत शुद्धातम।

अकृत्रिम भगवान् आत्मा, नित्य निरंजन परमातम।।टेक ।।

या बिन समझे भव-भव भटके, पावे दुःख बन बहिरातम।
याके दर्शन से दुःख विनशे, बन जावे अन्तर आतम ।।1।।

कर्मबन्ध यद्यपि अनादि से, तदपि मुक्त ध्रुव शुद्धातम।
जो ध्यावे परमानन्द पावे, ध्येय रूप शाश्वत आतम।।2।।

सुखी नरक में भी वे प्राणी, पहिचाना निज शुद्धातम।
धनि मुनिजन अविचल अनुभवते, सहज प्रसिद्धे ध्रुव आतम ।।3।।

शाश्वत मंगल लोकोत्तम प्रभु, अनन्य शरण निज शुद्धातम।
सहज चतुष्टय से नित शोभित, जय जय कारण परमातम।।4।।

अब निजरूप यथारथ पायो, जानूं जाननहार आतम।
नहीं भरमाऊँ अविचल ध्याऊँ, कहलाऊँ में भी परमातम ।।5।।


स्रोत: भक्ति-भावना (द्वितीय खण्ड)
Artist: श्री ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’
स्रोत: डॉ. विनोद ‘चिन्मय’