अब हम आतम को पहिचान्यौ | Ab hum aatam ko pahichanyo

अब हम आतम को पहिचान्यौ |
जब ही सेती मोह सुभट बल, छिनक एक में भान्यौ || टेक ||

राग विरोध विभाव भजे झर, ममता भाव पलान्यौ |
दरशन ज्ञान चरन में चेतन, भेद रहित परवान्यौ || १ ||

जिहि देखैं हम अवर न देख्यो, देख्यो सो सरधान्यौ |
ताकौ कहो कहैं कैसे करि, जा जानै जिम जान्यौ || २ ||

पूरब भाव सुपनवत देखे, अपनो अनुभव तान्यौ |
‘द्यानत’ ता अनुभव स्वादत ही, जनम सफल करि मान्यौ || ३ ||

Artist- पं. द्यानतराय जी

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अर्थ

अहो ! अब हमने आत्मा को पहिचान लिया है जब से हमने मोह नाम के प्रबल शत्रु को एक क्षण में जान लिया है। राग-द्वेषरूपी विभावों को क्षयकर मोहरूपी भाव का हमने नाश कर दिया है और अब अपने चित्त में सम्यकदर्शन, ज्ञान और चारित्र द्वारा भेदरहित एकमात्र अपने चैतन्य स्वरूप को जान लिया है। इसे देखने-जानने के बाद अब इसके अतिरिक्त हमने किसी को भी नहीं देखा और जो अपने इस चैतन्य स्वरूप को देखा जाना-पहचाना, उसका ही श्रद्धान/ विश्वास किया है। वह अवर्णनीय है, उसका कोई वर्णन नहीं किया जा सकता। जो उसे जानता है बस वही जानता है। अब तक रहे भाव सब स्वप्न के समान थे। अब मात्र अपनी आत्मा का अनुभव है। द्यानतराय कहते हैं कि उस अनुभव के स्वाद में, रस ही में शान्ति है, उसी में अपना जन्म सफल माना गया है।

स्रोत: द्यानत भजन सौरभ।

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