अब के जनम अरिहन्तों का सुमिरण | Ab Ke Janam Arihanton Ka Sumiran

तर्ज : अब के बरस तुझे धरती की रानी

अब के जनम अरिहन्तों का सुमिरण, कर लूँ मैं - अब के जनम,
अब के जनम सब सिद्धों का सिमरन, कर लूँ मैं - अब के जनम ।
अब के जनम निर्ग्रन्थों के संग-संग, विचर लूँ मैं - अब के जनम ।।
ये वो जिनवाणी है, कुन्दकुन्द ने मानी है,
भव्य जनों को ऽऽ, मात समानी है।
इस जिन अमृत को, चख लूँ मैं - अब के जनम ।। टेक ।।

अब के जनम निर्ग्रन्थों के संग-संग …

नर से नारायण बनना ही, जिनवाणी सिखलाती है,
आत्मज्ञान को कैसे करना, जिनवाणी बतलाती है ।
इस वाणी के जैसा जग में, कोई वचन नहीं है,
जिनवाणी से बढ़कर जग में, कोई शरण नहीं है।
भूतबलि और पुष्पदंत ने, सब ने यही है बोला,
कुन्दकुन्द आचार्य ने राज, परमागम में खोला ।
अब तक हम अज्ञानी हैं, इसकी बात न मानी है,
आचार्यों की लिपिबद्ध वाणी ऽऽ,
लिपिबद्ध वाणी पढ़ लूँ मैं - अब के जनम ।। 1 ।।
अब के जनम निर्ग्रन्थों के संग-संग …

सर्व कर्म के बन्धन को ही, जिनवाणी से हरना है,
जिनवचनामृत पीने को ही, जिनवाणी का झरना है।
मिथ्यातम के जैसा जग में, कोई घात नहीं है,
जिनवाणी से बढ़कर जग में, कोई मात नहीं है।
फिर भी हम अंधे हैं अपनी, माता की श्रद्धा पर,
पल पल जीवन बीता जाये, राग-द्वेष में जलकर ।


स्रोत: जिनवर भक्ति शतक (सामूहिक जिनेन्द्र पूजन समिति, कोटा)
संकलन: विक्रान्त कुमार जैन · सम्पादन: डॉ. वैद्य दीपक जैन