ऐसी समझ के सिर धूल | Aesi samajh ke sir dhool

ऐसी समझ के सिर धूल |
धरम उपजन हेत हिंसा, आचरैं अघमूल || टेक ||

छके मत-मद पान पीके, रहे मन में फूल |
आम चाखन चहैं भोंदू, बोय पेड़ बबूल || १ ||

देव रागी लालची गुरु, सेय सुखहित भूल |
धर्म नग की परख नाहीं, भ्रम हिंडोले झूल || २ ||

लाभ कारन रतन विराजै, परख को नहिं सूल |
करत इहि विधि वणिज ‘भूधर’, विनस जै है मूल || ३ ||

Artist : कविवर पं. भूधरदास जी

खोज: Aesi samajh ke sir dhul

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अर्थ

मदिरा (शराब) पीकर जो अपने मन में फूले नहीं समा रहे हैं, मदोन्मत्त हो रहे हैं, उनके परिणाम भले कैसे होंगे? जो आम खाना चाहे और पेड़ बबूल का बोये तो उसको आम कहाँ/कैसे मिलेंगे ?

देव रागी लालची गुरु, सेय सुखहित भूल।

राग-द्वेष से युक्त देवों की, लोभ और लालच से भरे गुरुओं की (अर्थात् जो देव राग-द्वेषसहित हो, जो गुरु लालच और लोभ से भरा हो, उनकी) अपने भले के लिए सेवा करना भूल है, इससे स्पष्ट है कि उसे धर्मरूपी रत्न की पहचान नहीं है और भ्रम के झूले में इधर-उधर डोल रहा है।

लाभ कारन रतन विणजै, परखको नहिं सूल।

भूधरदासजी कहते हैं धन लाभ के लिए रत्नों का व्यापार/वाणिज्य किया जाता है, पर जिसे रत्नों की पहचान नहीं है यदि वह व्यापार करेगा तो उसका तो मूल से ही नाश होना निश्चित है। अर्थात् धर्म के सिद्धान्तों को न जानकर विवेकहीन क्रियाओं को धार्मिक क्रिया मानकर करने से हानि ही होगी लाभ नहीं।

स्रोत: भूधर भजन सौरभ, पद 1।

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