मदिरा (शराब) पीकर जो अपने मन में फूले नहीं समा रहे हैं, मदोन्मत्त हो रहे हैं, उनके परिणाम भले कैसे होंगे? जो आम खाना चाहे और पेड़ बबूल का बोये तो उसको आम कहाँ/कैसे मिलेंगे ?
देव रागी लालची गुरु, सेय सुखहित भूल।
राग-द्वेष से युक्त देवों की, लोभ और लालच से भरे गुरुओं की (अर्थात् जो देव राग-द्वेषसहित हो, जो गुरु लालच और लोभ से भरा हो, उनकी) अपने भले के लिए सेवा करना भूल है, इससे स्पष्ट है कि उसे धर्मरूपी रत्न की पहचान नहीं है और भ्रम के झूले में इधर-उधर डोल रहा है।
लाभ कारन रतन विणजै, परखको नहिं सूल।
भूधरदासजी कहते हैं धन लाभ के लिए रत्नों का व्यापार/वाणिज्य किया जाता है, पर जिसे रत्नों की पहचान नहीं है यदि वह व्यापार करेगा तो उसका तो मूल से ही नाश होना निश्चित है। अर्थात् धर्म के सिद्धान्तों को न जानकर विवेकहीन क्रियाओं को धार्मिक क्रिया मानकर करने से हानि ही होगी लाभ नहीं।