अमृत पान करूँ अपने ही अंतर में, तृप्त सदैव रहूँ अपने ही अंतर में | Amrt Pan Karu Apane Hi Amtar Mem Trpt Sadaiv Rahu Apane Hi Amtar Mem

अमृत पान करूँ अपने ही अंतर में, तृप्त सदैव रहूँ अपने ही अंतर में।

किसे दिखाऊँ, किसको देखूँ ? देखनहार रहूँ अपने ही अन्तर में । ।।1।।

किसकी सुनूँ, सुनाऊँ किसको ? मात्र सदैव रहूँ अपने ही अन्तर में । ।2।।
पाने योग्य स्वयं में पाया, तुष्ट सदैव रहूँ अपने ही अन्तर में ।।3।।

शाश्वत वैभव अक्षुण्ण प्रभुता, परमानन्द लहूँ अपने ही अन्तर में । ।4 ।।
सहज पूर्ण सम्बन्ध न पर से, सहज ही मुक्त रहूँ अपने ही अंतर में। ।5।।
चाहे जैसे विश्व परिणमें, नहीं विकल्प कुछ भी ज्ञायक सहज रहूँ अपने ही अन्तर में। ।6।।


स्रोत: भक्ति-भावना (द्वितीय खण्ड)
Artist: श्री ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’
स्रोत: डॉ. विनोद ‘चिन्मय’