तर्जः अजित जिनेश्वर साँचे ईश्वर …
अहो जिनेश्वर ! हे परमेश्वर ! परम शरण सुखकार तुम्हीं ।
भव सागर में नाव पड़ी है, साँचे तारणहार तुम्हीं ।। टेक ।।
अरे ! स्वार्थमय बाह्य जगत् से, दिखे नहीं कुछ नाता है।
अवलम्बन जिसका भी लेवें, भव में वही फँसाता है ।।
बिन स्वारथ के तुम्हीं हितैषी, मोह नशावनहार तुम्हीं ।। 1 ।।
शुद्ध तत्त्व को नहीं पिछाना, पर में ही भरमाया था।
तत्त्वज्ञान की कला सिखाकर, प्रभुवर ! तुम्हीं जगाया है ।।
प्रभु प्रसाद से निज पद जाना, बंध छुड़ावनहार तुम्हीं ।। 2 ।।
दिव्य दर्श पाकर हे स्वामी ! सम्यक् भेदविज्ञान हुआ।
अपनी अक्षय प्रभुता देखी, अक्षय सुख का भान हुआ।।
हो निर्ग्रन्थ रमूँ निज में ही, मार्ग दिखावनहार तुम्हीं ।। 3 ।।
अहो ! आपका शासन पाया, भव में नहीं भरमाऊँगा।
हुआ सहज विश्वास महेश्वर, निश्चित शिवपद पाऊँगा ।।
भाव नमन हो, द्रव्य नमन हो, शाश्वत पद दातार तुम्हीं ।। 4 ।।
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ ३५ से ३६
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’