ओम् जय-जय अविकारी, स्वामी जय-जय अविकारी।
हितकारी भयहारी शाश्वत स्व-विहारी ॥ 1॥
काम-क्रोध-मद-लोभ न माया समरस सुखधारी।
ध्यान तुम्हारा पावन सकल क्लेश हारी ॥ 2 ॥
हे स्वभावमय जिन तुम चीना भव संतति टारी।
तुम भूलत भव भटकत, सहत विपत भारी ॥ ३॥
पर सम्बन्ध-बंध दुःख कारण करत अहित भारी।
परम ब्रह्म का दर्शन चहुँ गति दुःखहारी ॥ 4 ॥
ज्ञानमूर्ति हे सत्य सनातन मुनिमन संचारी।
निर्विकल्प शिवनायक, शुचि गुण भंडारी ॥ 5॥
बसो-बसो हे सहज ज्ञान घन सहज शान्तिधारी।
टले-टले सब पातक पर बल-बलधारी ॥ 6 ॥
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ ३४८ से ३४९
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’