तर्ज : मैं सदा से रहा…
अब निहारें अरे ! आत्म अन्तर को हम,
ज्ञान-दर्शन-चरित्र-सुख स्वयं जगमगे ।। टेक ।।
निज को जाने बिन हम भटकते रहे,
लेश भी सुख पाया नहीं आज तक।
दाह विषयों की अन्तर में जलती रही,
हम विकल्पों की आँधी में उड़ते रहे ।। 1 ।।
जब सहन न हुयी वेदना तड़फते,
पी लिया विष-विषय का सुधा जानकर।
मूर्च्छा गहरी हुयी होश कुछ ना रहा,
नीम मीठा लगा हम चबाते रहे ।। 2।।
सन्त बूटी का शुभ योग हमको मिला,
मोह का यह नशा कुछ उतरता चला।
नीम कडुवा लगे, अब रुचि न रही,
ये विषय तो हलाहल से अब लग रहे ।। 3 ।।
मात जिनवाणी की गोद सुखकर मिली,
मूसलाधार वर्षा जहाँ ज्ञान की।
चाह की दाह खुद ही शमित हो गयी,
समता रस का प्रवाह निरन्तर बहे ।। 4।।
आत्म उद्यान में रत्नत्रय अंकुर उगे,
भाव संयम की हरियाली छाई अहो।
वृक्ष चारित्र के पल्लवित हो चले,
फल लगे भाव क्षायिक के रस भरे ।। 5 ।।
स्वाद जिनका लिये तृप्त भविजन बने,
जिनकी छाया में नहिं ताप है राग का।
शान्ति सुखमय मिले, आत्म विश्राम है,
फिर ना आवागमन का ये फेरा रहे ।। 6 ।।
आत्मन् ! चेत अब भी समय है अरे,
क्यों अटकता-भटकता है पर्याय में।
शरण ज्ञायक प्रभु की तू ले-ले सही,
सुख अक्षय अतीन्द्रिय का निर्झर बहे ।। 7 ।।
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ ३६३ से ३६४
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’