आतम काज सँवारिये | Aatam Kaaj Sanvariye

आतम काज सँवारिये, तजि विषय किलोलैं
तुम तो चतुर सुजान हो, क्यों करत अलोलैं।।आतम. ।।
सुख दुख आपद सम्पदा, ये कर्म झकोलैं ।
तुम तो रूप अनूप हो, चैतन्य अमोलैं ।।आतम. ।।१ ।।
तन धनादि अपने कहो, यह नहिं तुम तोलैं ।
तुम राजा तिहुँ लोकके, ये जात निठोलैं ।।आतम. ।।२ ।।
चेत-चेत ‘द्यानत’ अबै, इमि सद्गुरु बोलैं ।
आतम निज पर-पर लखौ, अरु बात ढकोलैं ।।आतम. ।।३ ।।

रचयिता: कविवर द्यानतराय जी

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