आयो प्रभुवर शरण तिहारी।
दुःख विनश्यो परमानन्द उपज्यो, निज स्वाभाविक निधि निहारी ।। टेक ।।
दुर्विकल्प सब मिथ्या भासे, इन्द्रिय भोग महादुखकारी।
त्याग उपाधि आराधूँ निजपद, होऊँ निश्चय शिवमग चारी ।। 1 ।।
निमित्तभूत तुम ही जिन स्वामी, हृदय विराजो भव सरतारी।
हो पुरुषार्थ विषमता नाशे, समरस वर्ते आनन्दकारी।। 2।।
जाननहार रहूँ शिव पाऊँ, अचल अनूपम ध्रुव अविकारी।
सहज नमन हो भाव नमन हो, हो अद्वैत नमन उपकारी ।। 3 ।।
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ ६६
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’