अरे यह क्या किया नादान तेरी क्या समझपे पड़ गई धूल
अरे यह क्या किया नादान तेरी क्या समझपे पड़ गई धूल ॥ टेर ॥
आम हेत तैं बाग लगायो बो दिये पेड़ बम्बूल ।
फल चाखेगा क्या रोवेगा रहा है मन में फूल ॥
हाथ सुमरनी बाँह कतरनी निज पद को गया भूल ।
मिथ्या दर्शन ज्ञान लिया रहा समकित से प्रतिकूल ॥
कंचन भाजन कीच उठाया भरी रजाई शूल ।
न्यामत सौदा ऐसा किया जामें ब्याज रहा नाहीं मूल ॥
स्रोत: आध्यात्मिक भजन संग्रह (सं. श्री सौभाग्यमल जैन, पं. टोडरमल स्मारक ट्रस्ट, जयपुर, २००६), भजन ६४ (विभिन्न कवियों के भजन)
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