अब हम सहज भये न रुलेंगे ।। टेक।।
बहु विध रास रचाये अबलों, अब न भेष धरेंगे ||१।।
मोह महा दुःख कारण जानो, इनको न लेश रखेंगे ||२।।
भोगादि तो विष सम जाने, इनको वमन करेंगे ||३।।
जग जो कहें सो कहलो भैया, चिंता नाही करेंगे ||४।।
मुनिपद धार रहें वन मांही, काहू से नाहि डरेंगे ||५।।
अब हम आप सो आप में वसके, जग सों मोन रहेंगे ||६।।
अब हम गुपचुप निज में निज लख, और कछु न चहेंगे ||७।।
निज आतम में मगन सु होकर, अष्ट करम को दहेंगे ||८।।
निज प्रभुता ही लखते-२, शास्वत प्रभुता लहेंगे ||९।।
अपनी सहजता निरखी निज दृग, काहे न उमगेंगे ||१०।।
यो जग छूटो करम भी टूटो, सिद्ध शिला पै रहेंगे ||११।।
रचियता – आदरणीय बाल ब्रह्मचारी पंडित श्री सुमत प्रकाश जी