आये प्रभुवर शरण तुम्हारी।
अशरण जग में हे जिन स्वामी, तुम ही हो साँचे उपकारी ।।टेक।।
स्वारथवश साथी से दीखें, मित्र कुटुम्बादिक परिवारी।
स्वयं मोहवश दुखी विचारे, कैसे होवें सुख दातारी।।1।।
कर स्वाधीन आत्म आराधन, हुए अनन्त चतुष्टयधारी।
शिवमग दर्शायो भविजन को, करें नमन हे भवजलतारी।।2।।
यही भावना होवे जिनवर, लेकर आत्म शरण अविकारी।
अपनी निधि अपने में पावें, आवागमन मिटे दुःखकारी।।3।।
स्रोत: भक्ति-भावना (द्वितीय खण्ड)
Artist: श्री ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’
स्रोत: डॉ. विनोद ‘चिन्मय’