आज गिरराज निहारा, धन्य है भाग्य हमारा।
श्री सम्मेद नाम है जाको, भूपर तीरथ भारा।। टेक ।।
जहाँ बीस जिन मुक्ति पधारे, अवर मुनीश अपारा।
आरज भूमि शिखा मनि सोहे, सुर-नर मुनि मन प्यारा ।। 1 ।।
तहाँ थिर योग धार योगीश्वर, निज-पर तत्त्व विचारा।
निज स्वभाव में लीन होय कर, सकल विभाव निवारा ।। 2 ।।
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ ३०३
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’