अलौकिकवृत्ति | Alaukikavrtti

अहो
मुनिराज ।

रह निरपेक्ष सर्व भावों से वेदें निजपद सार । । टेक ।।

लौकिक जन पर ही को देखें, धारें भाव विकार।
ध्रुव दृष्टि ध्रुव आश्रय से ही मुनि होवें भव पार।।1।।

ज्ञेय लुब्ध लौकिक जन क्षण भी, लहें न आतम स्वाद ।
प्रचुर स्व संवेदनमय मुनि को किंचित् हो न विषाद ।।2 ।।

भोगासक्त लोकजन करते पाप हर्ष उर धार ।
उनका चिन्तन भी नहीं होवे, गुरु के स्वप्न मंझार।।3।।

लौकिक जन को भीड़ सुहाए, मुनि एकान्त विहार।
इष्ट-अनिष्ट न ठानें पर में, ज्ञाता भाव सम्हार।।4।।

लौकिक जन एकत्व धरें, मुनि भेदविज्ञान विचार।
शुद्धातम में मग्न रहें नित, नमन होय अविकार।।5।।


स्रोत: भक्ति-भावना (द्वितीय खण्ड)
Artist: श्री ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’
स्रोत: डॉ. विनोद ‘चिन्मय’
स्रोत: जिन-भक्ति सिंधु, पृष्ठ २२७ से २२८