अस्मि भावना
चैतन्य-चारु चिन्त्य चित्त-चैन चुनूँगा
चैतन्य को चुना है चैतन्य रहूँगा ।।
अब जागृति के गीत ही मैं नित्य गुनूँगा
चैतन्य का बना हूँ चैतन्य रहूँगा ।।
अनित्य भावना
टूटेगा एक क्षण में जीवन का ये दुःस्वप्न
छूटेगा देख! कण कण, बिखरेगा अंग अंग
बदलेगा शेष सब कुछ पर मैं न बदलूँगा
अस्तित्व से अनंत, मैं चैतन्य रहूँगा ।।
अशरण भावना
दुःख-मुक्ति सुख-भुक्ति की न आस करूँगा
असहाय इस जगत में न विश्वास धरूँगा
सब काल के खिलौने, मैं काल हरूँगा
अरहंत सिद्ध शरण, मैं चैतन्य रहूँगा ।।
संसार भावना
नहीं भव्य यहाँ कुछ भी रमणीय नहीं है
सौन्दर्य-भोग छल हैं, करणीय नहीं हैं
मैं थक चुका भटक अटक के अब न भ्रमूँगा
भवितव्यता विचार, मैं चैतन्य रहूँगा ।।
एकत्व भावना
है यात्रा अकेली बस भीड़ साथ में
नहीं साथ कोई साथी सामान हाथ में
पर संग का दुःस्वप्न तोड़ अब मैं जगूँगा
हूँ एक शुद्ध ज्ञायक, चैतन्य रहूँगा ।।
अन्यत्व भावना
अनन्य के परिणाम से न अन्य फल लहे
न अन्य का परिणाम-फल अनन्य को मिले
अन्य की अनन्य से न सन्धि लखूँगा
नहीं देह-कर्म-राग, मैं चैतन्य रहूँगा ।।
अशुचि भावना
यह देह शमशान-तुल्य म्लान, भीति है
वपु-राग-घृणित, शोकर-पुरीष-प्रीति है
संयम-चिता-तपा अशुचिता-देह तजूँगा
शुचि आत्मा सँभाल मैं चैतन्य रहूँगा
नेह जुदी देह को किंचित भी न दूँगा
स्वरूप-प्रीति धार मैं चैतन्य रहूँगा ।।
आश्रव भावना
इन इन्द्रियों को मन-वच-तन जो भी लुभाया
मिथ्यात्व-कषायों से खूब कर्म कमाया
खुद भूल से बँधा हूँ, अब मूल भजूँगा
सब राग-द्वेष टाल मैं चैतन्य रहूँगा ।।
संवर भावना
मैं सिद्ध हूँ स्वभाव से ये सिद्ध करूँगा
करमों के अकर्मण्य को प्रसिद्ध करूँगा
आयेंगी जब कषायें न उन से मिलूँगा
भाऊँगा भेद-ज्ञान, मैं चैतन्य रहूँगा ।।
निर्जरा भावना
वैराग्य बोधि जागे, लगा शील सँवरने
तप देख कर्म भागे, लगा धर्म बरसने
निश्चिन्त हो, विराग-पथ प्रवास करूँगा
शुद्धोपयोग लीन मैं चैतन्य रहूँगा ।।
लोक भावना
है दुःख नरक में स्वर्ग में सुख झूठी बात है
मिथ्यात्व से दुखी निगोद लोक-व्याप्त है
सुख का स्वयं पिटारा, क्यों दुःख लहूँगा?
त्रैलोक्य का तिलक हूँ, चैतन्य रहूँगा ।।
बोधि-दुर्लभ भावना
नहीं रूप रंग देह वचन मेरे चयन के
सौभाग्य! बोधि-ध्यान मुझे भा रहे मन में
नर भव मिला निराला नहीं व्यर्थ करूँगा
चारित्र चार धार मैं चैतन्य रहूँगा ।।
धर्म भावना
पाप को तो पापी भी पाप जानते
पर पुण्य को धर्मात्मा ना धर्म मानते
है साम्य आत्म-धर्म, वीतराग बनूँगा
शुद्धात्मा कमाल मैं चैतन्य रहूँगा ।।
चैतन्य-चारु चिन्त्य चित्त-चैन चुनूँगा
चैतन्य को चुना है चैतन्य रहूँगा ।।
अब जागृति के गीत ही मैं नित्य गुनूँगा
चैतन्य का बना हूँ चैतन्य रहूँगा ।।
स्वर: Divyansh Jain
संगीत: Anvay Jain
शब्द: Anubhav Jain
Sponsor: Mumukshu Mandal Chhindwara